दिव्यांगता प्रमाण पत्र केस में बड़ा एक्शन, 234 प्रवक्ताओं की एम्स ऋषिकेश में होगी दोबारा जांच

उत्तराखंड में दिव्यांगता के फर्जी प्रमाण पत्रों का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है. दरअसल पूर्व में विभाग में 52 प्रवक्ताओं के प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए थे, जिसके बाद विभाग स्तर से कार्रवाई का इंतजार हो रहा था. हालांकि इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, लेकिन अब विभाग ने सभी 234 प्रवक्ताओं के दिव्यांगता प्रमाण पत्रों की जांच कराने का निर्णय लिया है, जिसके लिए AIIMS में इन सभी प्रवक्ताओं की दिव्यांगता की जांच की जाएगी.

उत्तराखंड के शिक्षा विभाग में दिव्यांगता प्रमाण पत्रों को लेकर उठे सवाल एक बार फिर सुर्खियों में आ गए हैं. पहले विभागीय जांच में 52 प्रवक्ताओं के दिव्यांगता प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने के बाद अब सरकार ने इस पूरे मामले को व्यापक स्तर पर जांचने का फैसला किया है.

इसी क्रम में शिक्षा विभाग ने राज्य भर के सभी 234 प्रवक्ताओं के दिव्यांगता प्रमाणपत्रों की दोबारा मेडिकल जांच कराने का निर्णय लिया है. यह जांच अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ऋषिकेश के मेडिकल बोर्ड द्वारा की जाएगी.

दरअसल शिक्षा विभाग में प्रवक्ता पद पर कार्यरत कई शिक्षकों के दिव्यांगता प्रमाण पत्रों को लेकर लंबे समय से सवाल उठ रहे थे. विभागीय स्तर पर पहले भी इस मामले में जांच कराई गई थी, जिसमें 52 प्रवक्ताओं के प्रमाण-पत्र संदिग्ध या फर्जी पाए गए थे. इसके बाद विभाग की ओर से संबंधित शिक्षकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया था, लेकिन उस स्तर से आगे कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी. ऐसे में अब पूरे प्रकरण ने विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती का रूप ले लिया है.

न्यायालय आयुक्त दिव्यांगजन की ओर से भी शिक्षा विभाग को निर्देश दिए गए थे कि जिन शिक्षकों के प्रमाणपत्र गलत पाए गए हैं, उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए, लेकिन अब तक किसी भी शिक्षक पर प्रत्यक्ष कार्रवाई नहीं की गई है. यही वजह है कि अब विभाग ने पूरे मामले की व्यापक जांच कराने का निर्णय लिया है.

शिक्षा विभाग का मानना है कि यदि किसी ने फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी या आरक्षण का लाभ लिया है तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि वास्तविक दिव्यांग उम्मीदवारों के अधिकारों के साथ भी अन्याय है. ऐसे में जांच पूरी होने के बाद दोषी पाए जाने वाले शिक्षकों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई की संभावना भी जताई जा रही है.

अब सबकी निगाहें एम्स ऋषिकेश में होने वाली इस मेडिकल जांच पर टिकी हैं. जांच के परिणाम सामने आने के बाद ही यह साफ हो सकेगा कि वास्तव में कितने शिक्षक दिव्यांगता के पात्र हैं और कितनों ने गलत तरीके से इसका लाभ लिया है. शिक्षा विभाग की इस पहल को प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

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