उत्तराखंड के शहरी विकास विभाग में इन दिनों जबरदस्त हंगामा मचा हुआ है। सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति और पारदर्शिता के दावों के बीच विभाग में एक ऐसी नियुक्ति का मामला सामने आया है, जिसने पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) पर हुई एक हाई-प्रोफाइल नियुक्ति से जुड़ा है, जिसको लेकर अब उत्तराखंड बेरोजगार संघ आर-पार के मूड में आ गया है। संगठन ने शहरी विकास मंत्री राम सिंह कैड़ा, सचिव IAS नितेश झा, संयुक्त सचिव महावीर सिंह चौहान और निदेशक विनोद गोस्वामी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए सीधे-सीधे अल्टीमेटम दे दिया है कि वह कार्रवाई करे वरना निदेशालय में ताला जड़कर उग्र आंदोलन किया जाएगा.
पूरा विवाद ‘रवि पांडे’ नाम के एक अधिकारी की संविदा नियुक्ति को लेकर है। आरोप है कि अफसरों ने नियमों को ताक पर रखकर रवि पांडे को फायदा पहुँचाने के लिए पूरी प्रक्रिया ही बदल डाली। बताया जा रहा है कि इस नियुक्ति को लेकर पहले ही लिखित शिकायत दी गई थी, लेकिन जिम्मेदार अफसरों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। बाद में जब सूचना का अधिकार (RTI) के तहत दस्तावेज निकाले गए, तो कई हैरान कर देने वाली परतें उधड़कर सामने आईं।
आरटीआई से मिले दस्तावेजों से इस पूरी चयन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शर्तें ही ऐसी बनाईं गईं कि केवल एक की एंट्री हो सके। आरोप है कि पद के लिए योग्यता और शर्तें इस तरह तैयार की गईं, जिससे केवल रवि पांडे ही इसके दायरे में आ सकें।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इस पद के लिए सिर्फ और सिर्फ रवि पांडे का ही एकमात्र आवेदन आया। कायदे से जब सिर्फ एक आवेदन मिला था, तो मुकाबले और निष्पक्षता के लिए दोबारा आवेदन मंगाए जाने चाहिए थे। लेकिन अफसरों ने ऐसा न करके सीधे रवि पांडे के नाम पर मुहर लगा दी।
कागजों का खेल देखिए। 29 मार्च 2026को विज्ञापन जारी हुआ।15 अप्रैल 2026को फॉर्म भरने की आखिरी तारीख थी। 17 अप्रैल 2026को अफसरों ने नियुक्ति की सिफारिश कर दी। 24 अप्रैल 2026को रवि पांडे ने पद संभालने की अपनी सहमति दे दी और 30 अप्रैल 2026को रवि पांडे अपने नियमित सरकारी पद (अधीक्षण अभियंता) से रिटायर हुए।यानी सरकारी सेवा में रहते हुए और रिटायरमेंट से हफ्ते भर पहले ही संविदा पद के लिए सहमति बन गई।

सहमति पत्र में 2.50 लाख रुपये प्रति महीने का मानदेय और हर साल 25,000 रुपये की वेतनवृद्धि (इंक्रीमेंट) की भारी-भरकम शर्त शामिल है। बेरोजगारों का सवाल है कि किस नियम के तहत किसी एक व्यक्ति को यह खास सहूलियत दी गई?